ज़िन्दगी CUT नहीं रही "CONSUME" हो रही है


जब भी मिलते हैं लोग तो पूछते हैं "और ज़िन्दगी कट रही हैं ना?" सोचता हूँ कि ज़िन्दगी का कटना अच्छी बात नहीं लगती और फिर आजकल के भौतिकवाद में सबकुछ CONSUME ही तो होता है.
इस तरह से शुरू हुआ मेरा जवाब "जनाब ज़िन्दगी कट नहीं रही, कहिये consume हो रही है".
पहले तो लोगों को अचरज होता है, फिर बताना पड़ता है और फिर वो समझ जाते हैं. पर फिर दोबारा मिलने पर पूछ लेते हैं "और ज़िन्दगी कट रही हैं ना?"!

हर सुबह हर शाम और हर रात जो भी इंसान करता है वह सब consume ही तो करता है. सोच कर देखिये - टूथ पेस्ट, ब्रेक फास्ट, पब्लिक प्राइवेट ट्रांसपोर्ट, लंच, डिन्नर, रिश्तेदारी, सामाजिक जिम्मेदारियां सब का सब हर दिन consume ही हो रहा है, cut कहाँ रहा है.

Consumption शब्द जो है वो बाज़ार को भी बड़ा प्रिय लगता है. बाज़ार बिना इसके कैसे चलेगा भला?

तो ज़िन्दगी एक "product / service [उत्पाद / सेवा]" है जिसकी कोई ना कोई "shelf-life" है. उसकी फिर एक "life cycle [जीवन चक्र]" है और इस चक्र में हर पल Consume होता है. और जहाँ Consumption है वहां comparison [तुलना] है.

जब तुलना होगी तो तेरी मेरी ज़िन्दगी सदा अलग अलग ही होगी.

जीवन अगर तुलना में निकल जाए तो अपने सपने पीछे रह जाते हैं.

कहने का मतलब है - ज़िन्दगी ना तो CUT रही है ना ही CONSUME होती है बल्कि "निभती" है हर दिन हर पल. हम निभाते हैं जीवन को हर रोज़. चाहे अच्छी हो चाहे बुरी हो या फिर चाहे निष्क्रिय हो.

पर क्या करें - आजकल CONSUMPTION IS EVERYTHING.

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