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हिंदी कविता - अंततः

अंततः

अंततः यही तो होना है,
सुन्दर पहनना और अच्छा खाना,
दुनिया के रंग में रंगते जाना
अंत में चिता ही बिछोना है.

और हाय यही विडंबना है,
वह किसी का अपना है और,
किसी का वह सजना है
किसी का वह जन्मा है
उसका भी एक सपना है
फिर भी यही विडंबना है
अंततः चिता ही बिछोना है.

अरे लाश..कुछ तो मुख खोल,
अब जरा सुनु गर्व भरे बोल,
अब दिखा हेकड़ी, जमा अब गोल,
हो गया तेरा भी मोल-तोल,
और हाँ यही विडंबना है,
अंततः चिता ही बिछोना है.

कल बड़ा चहकता था तू,
आती होगी बस तुझमे बू,
और अब तेरी विडंबना है,
अंततः चिता ही बिछोना है.

कल तक तूने बहुत कमाया,
तन पर आज कपडा ना जुराया,
आँखें खुली या है पथराया-
मौत सी सीना तान ना पाया,
समझा? तेरी यही विडंबना है,
अंततः चिता ही बिछोना है -
अंततः चिता ही बिछोना है.

संवत १९९० में अयोध्या के सरयू नदी के घाट पर ठिठुरती जाड़े की रात में जलती किसी लाश के किनारे बैठ कर कुछ सच देखे थे, कुछ गर्माहट पायी थी. कलम ने उन  राख के कुछ टुकड़ों को कागज़ पर ढलवाए थे.